Thursday, 21 January 2016

नारी की खोज –--11


  

अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 से 10 तक में ) ...की मैंने  बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....



गतांक से आगे .......



इन्सान जिस घर और समाज में जन्म लेता है वहां  जन्म के साथ ही उसे कुछ रिश्ते नाते इस सामाजिक व्यवस्था द्वारा उपहार में दे दिए जाते है , कुछ रिश्तों  का वह  आगे चलकर, खुद निर्माण करता है , पर समझने वाली बात है , क्या एक  इन्सान को जीवन में खुश रहने या जीवन बसर करने के लिए इन रिश्तो की आवश्यकता है ?



शायद ,रिश्तों का निर्माण सामाजिक व्यवस्था  द्वारा इन्सान को वक़्त जरुरत पड़ने पर सहारा और हौंसला  देने के लिए किया गया , पर कई बार यह रिश्ते नाते सहारा  देने की जगह अनचाहा बोझ और हौंसले  की जगह पाँव  की बेड़ी  बन कर इन्सान को जीवन भर घसीट कर चलने के लिए मजबूर कर देते है , जब जब इन्सान इस अनचाहे बोझ और बेड़ी  से मुक्त होने का प्रयास करता है , उसे इन्हीं  रिश्तों की सामाजिक मान मर्यादा का हवाला देकर डराया और शोषित किया जाता है ...कभी यह शोषण मज़बूरी में , तो कभी बहला फुसला कर करवा लिया जाता है,जब तक इन्सान के कुछ समझ आता है , तब तक बहुत देर हो चुकी होती है ,उम्र उसका दामन छोड़ने वाली होती है और वह  ना चाह कर भी इस कैद में मरने को मजबूर होता है, तब  इन्सान अपने आप से पूछता , मुझे इन रिश्तो से, आखिर क्या मिला ?  



मैंने  ब्रांच ऑफिस से अपना बोरिया बिस्तरा समेटा और रीजनल ऑफिस के पास के एक  होटल में डेरा जमा लिया ।  अब कुछ महीने मुझे एक  भटकते मुसाफिर की तरह काटने थे , दुनिया गोल है और कई बार हम वापस उसी बिन्दु पर  जाकर खड़े हो जाते है ,जहां  से हमें अपनी पहली यात्रा की शुरुवात की होती है, इसे मुझ से ज्यादा कौन समझ सकता था , आज मैं वापस उसी शहर में आया था , जहां  से मैंने  इंजीनियरिंग की पढाई की थी ....



अब यह शहर काफी बदल चूका था साथ में मेरी हैसियत और हालत भी .... कॉलेज के दिनों में जो जो रेस्टुरेंट एक  सपने होते थे , अब वह  मेरी रोज़मर्रा  की जिन्दगी का हिस्सा थे , उन दिनों जिन जिन जगह हम खाना खाने का प्रोग्राम बड़ी हसरत से बनाते  थे , वह  सब जैसे मामूली सी चीज लगती थी , यहां  आकर मैंने  अपनी कॉलेज के  खाने पीने  और सिनेमा की अधूरी इच्छाओं  को जमकर पोसा , उसका परिणाम यह निकला , मैंने  कुछ ही महीनों  में काफी वेट गेन कल लिया .....जिसे मैं आज तक ढो रहा हूँ ..

रीजनल ऑफिस की आबो हवा , वातावरण और काम करने के तरीके सब मे ब्रांच ऑफिस से जमींन आसमान का फर्क था ...ब्रांच ऑफिस में हम कुछ टेक्निकल लोग ही होते थे , एक सुन्दर  अदद नारी के दर्शन भी वहां  दुर्लभ थे , इसके विपरीत यहां  , एक  से एक  सुन्दर नारी , हमारे नयन सुख के लिए मौजूद थी , यहां  टेक्निकल स्टाफ के अलावा , कस्टमर केयर , ह्यूमन रिसोर्स , मार्केटिंग और एकाउंट्स डिपार्टमेंट भी था , ना जाने कैसे सबने अपने अपने डिपार्टमेंट में एक  से बढ़ कर इक नगीने भरती किये थे , लगता था जैसे.... सारे शहर की ब्यूटी हमारी कम्पनी के ऑफिस में आ गई थी ...



यहां  आकर मुझे सब कुछ मिला , नाम , इज्जत और पैसा ,हमारी कंपनी का सी ई ओ , मुझे सबसे ज्यादा काबिल मैनेजर  समझता था ,बस मेरा काम पहले टेक्निकल था ...अब वह  मैनेजरियल टाइप हो गया , जिसकी वजह से मुझे काफी भाग दौड़ करनी होती ... मुझे एक  पुरे एरिया को मॉनिटर करना होता था , इस सिलसिले में मैं अक्सर आस पास के शहरों  का रोज़  दौरा करता .... कहाँ तो मैं ब्रांच ऑफिस में यह सोच कर गया था की कुछ महीनों  में वापस आजाऊंगा , पर रीजनल ऑफिस में आकर लगा की , वापसी बड़ी दूर है ..... उस ज़माने में, मैं अपनी नॉलेज का दायरा सिर्फ टेक्निकल तक ही सिमित रखना चाहता था ,ताकि जल्दी से जल्दी हेड ऑफिस वापस जा सकूँ .....क्योंकि हेड ऑफिस ही मेरे घर के पास था और उस वक़्त हेड ऑफिस में सिर्फ टेक्निकल लोगो की डिमांड थी ....



जीवन में सब कुछ था , बस घर परिवार से दूर , ऐसे में सब कुछ होते हुए भी मुझे, एक  बैचेनी होती , की जल्दी से जल्दी यहाँ  से ट्रान्सफर करवा के अपने घर कैसे पहुँचू।  



काश उस वक़्त कोई मुझे, मेरा भविष्य दिखा देता ,की जिस घर परिवार के लिए मैं बैचेन हूँ , वही एक  दिन मेरे सर का बोझ और पांव के बेडी बन जाएगा, तो शायद मेने जीवन का वह  लम्हा , बड़ी शिद्दत से जिया होता ?



यहां  ऑफिस में एक  से बढ़ कर एक  कलियाँ और फूल थे , पर बदकिस्मती तो जैसे मेरी परछाई बनकर मेरे साथ आई थी , मैं ऑफिस में सुबह सुबह आता , अपने सी ई ओ से रिपोर्ट डिस्कस करता और दौरे पर  निकल जाता तो देर शाम को लौटता , उस वक़्त तक सारी चिड़ियाँ चह चाह कर वापस अपने गुलिस्तां  में लौट चुकी होती ... उन्हें सुबह आते हुए देखना या फिर शाम को ज्यादा से ज्यादा जाते हुए देखना भर नसीब होता और कई बार तो काम के सिलसिले में मुझे दुसरे शहरो में भी रहना पड़ता इसलिए ऑफिस आना भी यदा कदा होता , जब भी ऑफिस आना होता तब कभी किसी चिड़िया के चहचहाने की आवज सुन पाता ...



एक  दिन किसी काम से, मैं दोपहर को ऑफिस आया , ऑफिस में एक  कमरा था , जिसमे सिर्फ ट्रेनी इंजिनियर ही बैठेते था या कभी कभी हम जैसे मुसाफिर आकर अपना थोड़ी देर का डेरा एक  दो दिन के लिए वहां  लगाते थे ..मै कमरे में जैसे घुसा तो देखा , एक  इंजिनियर लड़की साथ वाले लड़के के साथ किसी मैप पर झुकी  कुछ डिस्कस कर रही है ...मैंने  उस पर ध्यान भी न दिया और थोड़ी देर कमरे में बैठ वापस चला गया ...



ऐसा सिलसिला एक  दो बार और चला , मैंने  उस लड़की को ध्यान से देखा ही नहीं , एक  दिन जब मैं कमरे में घुसा तो देखा , एक  निहायत ही खुबसूरत लड़की जो दिखने में 23 /24  साल की होगी ,उस कमरे में अकेली बैठी थी , उस वक़्त एक   साडी उसके खुबसूरत बदन को लपेटे हुए थी , जैसे ही मैं कमरे में घुसा तो उसने अपना चेहरा उठा कर मुझे देखा ,जब मैंने  उसे देखा तो देखता ही रह गया , इतनी सुन्दर लड़की इतने करीब से, मैंने  आज से पहले अपने जीवन में शायद दो चार बार ही देखी  होगी ...



संगमरम के जैसा चिकना बदन जिसे एक  मंझे हुए कारीगर ने आराम से तराश  कर सांचे में ढाला हो , उसपर  उसकी गोल गोल बड़ी बड़ी आंखे , जिसपर  काजल ने सज कर अपनी किस्मत को सराहा होगा और चौड़े  माथे पर एक  बड़ी सी बिंदी ,जो अपने को किसी ताज से कम नहीं समझ रही थी , होंठों पर  सजी गहरे कथई रंग की लिपस्टिक उन्हें किसी छलकते जाम को चुनौती दे रही थी और जैसे कह रही थी की हिम्मत है तो आओ मुझे छू  के दिखाओ , यह सब उसकी सुन्दरता में सज कर अपने को धन्य मान रहे थे ...

ऐसा लगता था इन्सान के ईमान को बहकाने  की ....उसने पूरी तैयारी कर रखी थी , उसे देख ,लगता था मधुबाला ने धरती पर पुनर्जन्म ले लिया हो ....मेरी आँखे थी की उससे हटती ना थी ... अचानक उसकी आवाज से मैं जागा ,जब उसने मुस्कुराते हुए कहा , सर , इस बार तो बहुत दिनों बाद आए ?



उसकी खनकती हुई हंसी और बड़ी बड़ी गोल आँखे जैसे मुझसे पूछ रही थी , बस एक  ही वार में चित्त  हो गए , उसकी बात पर  गौर दिया तो मुझे यह बात सुन हैरानी हुई की वह  मुझे कैसे जानती है ?मैंने अपनी हैरानी को जैसे अपने सवाल में उड़ेल दिया और बोला , मैंने  तो तुम्हे आज पहली बार देखा है , फिर तुम मुझे कैसे जानती हो ?

मेरी बात पर वह  जोर से हंसी और बोली , अरे सर आपको कौन नहीं जानता ? वैसे भी आप पहले कई बार यहां  आ चुके है , अब चौंकने  की बारी मेरी थी , मैं यहां आया और इस खुबसूरत नगीने को बिना देखे चला गया , आखिर यह गुस्ताखी मैंने  की तो कैसे और क्यों की?



मैंने  कमरे की एक  टेबल पर  अपना ब्रीफ़केस रख दिया और उसमें कुछ ढूंढने  के बहाने बीच बीच  में , उसपर  अपनी नज़रें  इनायत कर देता ....जब जब मैं उसे देखता , मेरी साँस थी की मेरा साथ छोड़ने को तैयार बैठी थी , उसकी मौजूदगी में एक  ऐसा नशा था ,



जो मुझे चुनौती  देकर पूछ रहा था की  , अब तुम इसमें डूबे बिना ना रह पाओगे ...उसे जितना में निहारता , उतना ही उसके मदहोश हुस्न में खोता जाता ...



मेरी निंद्रा टूटी जब उसके साथ काम करने वाले एक  ट्रेनी इंजिनियर ने उससे कुछ कहा ....मुझे वहां  देख, वह  बड़े जोश में बोला , अरे सर बहुत दिनों बाद दिखलाई दिए , वह  लड़का मुझे पहले से जानता था ... उस लड़की के बारे में जानने की मेरी जिज्ञासा चरम सीमा पर थी , मैंने  उसे इशारे से बहार बुलाया और पुछा यह कौन है ?



वह  तो जैसे उसका पूरा बायोडाटा तैयार लिए बैठा था ...जोश में बोला अरे सर , इसका नाम ऋतू है , इसने कुछ दिन पहले ही ज्वाइन किया है , अरे यह तो आपके ही कॉलेज से पास आउट है , इसे तो आपके ब्रांच ऑफिस वाले बंगाली दादा ने कैंपस से सेलेक्ट किया है और ऐसा कह उसने अपनी एक  आँख दबा दी ..... अब मेरी इच्छा उसके बारे में और जाने की थी ...उस वक़्त तो मैंने  उसे कुरेदना ठीक ना समझा ....बात आई गई हो गई , मैं अपने काम में बिजी हो गया ....



एक  दिन किसी साइट  का काम ख़त्म करवाने के बाद ,मैं वापस ऑफिस आया था , अब मुझे कुछ दिन ऑफिस में ही आना था , बहुत ज्यादा गर्मी होने की वजह से साईट का काम रुका पड़ा था ...कमरे में घुसा तो नज़रें  जैसे ऋतू को ही तलाश रही थी , वह  कुछ अपने साथ के ट्रेनी के साथ गप्पों में मशगुल थी , मेरे आने से उन सब में एक हड़कंप सा  मच गया और सब अपनी जगह खड़े होकर , कहने लगे अरे सर यहां  बैठे ....



एक  अच्छी सी टेबल लेकर मैंने अपना डेरा वहां  जमा लिया और उन लोगो के साथ गुफ़्तगू  में लग गया ... एक  दो दिन की हल्की  मुलाकात के बाद , मैं वहां  बैठने वाले लोगो के बारे में कुछ कुछ जान गया , अधिकतर इंजिनियर, मैनेजमेंट ट्रेनी थे , जो कैंपस के थ्रू कुछ ही दिनों पहले ज्वाइन हुए थे .....



अब मैं जब भी ऑफिस आता , ऋतू से मुलाकात हो ही जाती , उसके और मेरे लेवल में काफी फर्क था इसलिए उससे सीधे बात करना उचित ना लगता , दुसरे वह  किसी और को रिपोर्ट करती थी ,इसलिए उससे मेरा कोई सीधा काम भी ना था , पर मेरा ऑफिस भी उसी कमरे में था , इसलिए वहां  बैठते हुए , उससे कुछ ना कुछ बाते हो जाती ...



अधिकतर ट्रेनी वहां  सिर्फ गप्पे हांकने के लिए ही बैठते थे , वरना सब बाहर  जाकर अपनी अपनी साइट  का काम देखते ...ऋतू को जब भी मौका मिलता वह  मुझसे कुछ ना कुछ हंसी मजाक जरुर कर लेती , अब इतने लोगों  के बीच , उसकी बातों पर हंसने  के सिवा , मैं कुछ नहीं कह सकता था ...वहां बैठने वाले सारे ट्रेनी और दुसरे डिपार्टमेंट के लोग मौका देखा ऋतू पर लाइन जरुर मारते , जिसे वह  अक्सर मुझे जरुर बताती ....शायद उसे भी पता था ,की वह वहां  की क्वीन है ...



ऋतू के बारे में जाने पर पता चला तो मन में कुछ अजीब सा हो गया , वह एक  तलाक शुदा औरत  थी , जिसके १ साल का एक  बेटा भी था ...छोटी उम्र में उसे किसी से इश्क़  हुआ था , जिसकी वजह से वह प्रेगनेंट  हो गई थी और उसे पढाई के  बीच में ही शादी करनी पड़ी थी , उसके पिताजी शहर के एक  जाने माने आई ए एस  ऑफिसर थे ...खैर  इन बातों  का मुझे क्या फर्क पड़ना था , मैं एक  उड़ता बादल था , जिसे तो बस बरसना था , अब वहां पर सुखा रेगिस्तान हो या हरियाली जमींन , उसके लिए सब एक सामान था ...



ऋतू एक  फैशनेबल  लड़की थी , जिसे मेकअप से लेकर फैशन के कपडे  सबका अच्छा ज्ञान था....

ऐसे ही एक  दिन बातो ही बातो में मेने उससे कहा , तुम मॉडल लगती हो , इसपर  उसने हँसते हुए कहा मैं लगती नहीं हूँ ,बल्कि हूँ भी , उसने बताया की ,कॉलेज के दिनों में उसने ऐड एजेंसी के लिए छोटी मोटी मॉडलिंग  भी की हुई है ... उसे जब भी मौका मिलता वह  मेरे कपड़ो पर एक  छींटा कशी जरुर कर देती , उसे मेरे कपड़ो के सिलेक्शन से एक तरह की  चिढ सी थी , जब भी उसे मौका मिलता , वह मुझे कपडे पहनने का सलीका समझाने लगती , की जींस को मोड़ कर नहीं पहनना चाहिए , किस तरह की शर्ट के साथ कैसी पैन्ट्स पहननी चाहिए आदि आदि .....मैं उसकी बाते सुनता और हंसी में उड़ा देता , उक वक़्त काम ही कुछ ऐसा था , की टॉवर  लगवाने के लिए धूल  भरी साईट के सर्वे के बाद , सारे कपडे , गंदे और धुल  से भरे होते ...



मैं जब जब ऑफिस आता , वह  मुझे देख खिल उठती और मेरे करीब आने के बहाने बनाती , अब मज़बूरी ऐसी थी की , लड़की के चक्कर में , मैं  पहले ही एक  नौकरी गवां चूका था , दूसरी गंवाने  का मेरा इरादा न था , इसलिए उससे मैं दूर से ही बात करता , पर वह  तो कोई मौका ही ना छोडती ...



जितना मेरा ऋतू से सामना होता , उतना ही मेरा दिल उसे देख धड़कता  , पर मज़बूरी ऐसी थी , की मैं उस कमरे में ज्यादा देर बैठ नहीं सकता था , मेरा सी. ई. ओ. , मुझे बुलावा देकर अपने कमरे में गप्पे करने के लिए बुला लेता और पूरा दिन वहीँ  निकल जाता ...



कुछ दिनों से ऋतू मेरे पीछे पड़ी थी की ,मैं उसे GSM मोबाइल टेक्नोलॉजी को समझाऊँ , मैं उसे बहाने बना कर टकरा देता , एक  दिन कमरे में वह  और मैं अकेले बैठे थे , बस मौका देख वह  मेरे पीछे पड़ गई , की आज तो मैं उसकी क्लास ले ही लूँ ... उस दिन मेरे पास कोई ख़ास काम भी ना था इसलिए मैंने  भी मज़बूरी में हाँ कर दी ......



वह  मेरी टेबल के पास एक  कुर्सी खींच  कर बैठ गई , मैं उसे मोबाइल टेक्नोलॉजी के बेसिक कांसेप्ट समझाने लगा , कैसे मोबाइल फोन, पास के मोबाइल टॉवर  से कनेक्ट करता है , कैसे टॉवर  , एक्सचेंज को सिग्नल भेजता है आदि आदि , जैसे जैसे मैं उसे समझाने में लगा था , वह  धीरे धीरे मेरे करीब आने  लगी , उस वक़्त कमरे में सिवाए हम दोनों के कोई और ना था , मेरी आवाजे बीच बीच  में सन्नाटे को भंग कर देती थी ...



अभी मैं झुका हुआ कागज पर  कोई डायग्राम बना रहा था की अचानक ऋतू का घुटना मेरे घुटने से सट गया , उसके घुटने का छूना था की मुझे एक ज़ोर  का करंट लगा , पर वह  तो ऐसे दिखा रही थी जैसे कुछ हुआ ही नहीं ...मैंने झिझकते हुए अपना घुटना पीछे कर लिया , थोड़ी देर बाद फिर से , उसने अपना घुटना मेरे घुटने से सटा दिया और अपना चेहरा मेरे चेहरे के इतना करीब ले आई  ...की उसकी सांसो की गर्मी मैं अपने करीब महसूस कर रहा था , उसका चेहरा मेरे चेहरे से लगभग सटा हुआ सा था , पर उसकी निगाहें  मेरी कॉपी पर थी ...मैं उसे क्या समझा रहा था और वह  क्या समझ रही थी यह तो खुदा ही जाने....

उसके शरीर  की गर्मी उसके घुटने से होती हुई मेरी घुटनों से टकरा कर मुझे बैचेन कर रही थी, मेरी साँस जैसे अटकी हुई थी की अगर किसी ने हमें ऐसे देख लिया तो ,क्या होगा ?



किसी तरह अपने पर  काबू रख मैंने , अपना लेक्चर ख़त्म किया , उसने अपना चेहरा उठाया तो उसके आँखे एक  खुला निमत्रण दे रही थी ...मैं अभी कुछ कहता या सुनता की , मनहूस सी. ई. ओ. का बुलावा आगया ...मैं उसे उसी हालत में छोड़ चला गया और जब वापस लौटा तो वह  अपने घर जा चुकी ..उस दिन के बाद मैं इसी तलाश में रहता की अब फिर कब उससे अकेले में मिलने का मौका मिले , पर अधिकतर समय कोई ना कोई ट्रेनी कमरे में बैठ होता ...



पुरे  ऑफिस को पता था की मैं यहां  से काम ख़त्म करने के बाद हेड ऑफिस वापस जाने के लिए बैचेन हूँ , जब जब ऋतू से मेरा सामना होता , वह हर बार मुझे कहती की मैं अपना जाना कैंसिल कर दूँ और यहीं  सेटल हो जाऊं  ...मेरा सी. ई. ओ. मुझे नए नए लालच देता , की मेरा प्रमोशन कर देगा आदि आदि , पर उस वक़्त मेरे दिमाग में सिर्फ घर के सिवा कुछ ना घूमता था ...

एक  दिन ऋतू ने मुझसे पूछ लिया , की आप वापस जाने के लिए क्यों बैचेन हो ? यहीं  रहो और जिन्दगी को मजे में काटो , ऐसा कहते हुए उसने अपनी गोल गोल आँखे मुझपर  टिका दी , मैंने कहा की मुझे अपनी बहन की शादी करनी है , मेरा बच्चा छोटा है ,जो मुझे याद करके रोता है , मेरे ऊपर घर की कई सारी जिम्मेदारीयां है ...



ऋतू ने एक  गहरी सांस ली और बोली , उन सब को भूल कर सिर्फ अपने बारे में सोचे , की आपकी ख़ुशी किस में है , बीवी बच्चे सब अपना काम चला  ही लेंगें  , उन्हें बस पैसे भेजते रहना और बची बहन की तो वह  आपकी नहीं आपके पिताजी की जिम्मेदारी है ...मैं तो यही कहूँगी की , आप यहीं  रूक जाओ ... उसने मुझसे बहुत बहस की और रुकने के लिए बहुत दबाब डाला , पर मैंने  उसकी हर दलील को अपने तर्कों से काट दिया .....



शायद मेरी यह बहस उसे पसंद नहीं आई या मेरी किस्मत की , उसके बाद मेरी उससे मुलाकात कुछ दिनों तक हो नहीं पाई , इक बार जब उससे मिला तो उसका व्यवहार  रुखा रुखा सा था , किसी ट्रेनी ने बताया की उसका किसी साथ वाले ट्रेनी से अफेयर चल रहा है ...



दिल को यह जानकार एक  धक्का सा लगा , पर उस वक्त इन सबमें  पड़ने का मेरे पास वक़्त ना था , मैं अपनी साइट  के मोबाइल टॉवर  का काम ख़त्म करके जल्द से जल्द हेड ऑफिस पहुँचने के चक्कर में व्यस्त था ..एक  महीने बाद , मैं अपना काम ख़त्म करके रीजनल ऑफिस से अलविदा लेकर हेड ऑफिस जा रहा था ....



पर उस वक़्त मुझे क्या मालुम था , आने वाले दिनों में रिश्तो और इंसानियत का एक  बदनुमा दाग जीवन भर के लिए मेरी यादो में लगाने वाला था ...



हेड ऑफिस में मैंने  अपना ट्रान्सफर तो करवा लिया , पर मैनेजमेंट मुझसे खुश ना थी , उन्हें लगता था , मैंने  रीजनल ऑफिस का काम अच्छे से संभाला हुआ था , मुझे वहीँ रहना चाहिए था , इसका नतीजा यह निकला , मुझे हेड ऑफिस में एक  बेकार सा काम दे दिया गया और  उसके साथ मेरी सारी सुविधाएं  भी चली गई ...



घर यह सोच कर आया था ,की मेरे ना होने से घर वाले और बीवी बच्चे परेशान रहते होंगे , पर हकीक़त  इससे जुदा थी , किसी को मेरी जैसे परवाह ही ना थी , जब मैं टूर पर  था , तब मेरे पास एक्स्ट्रा पैसे होते थे , जो घर वाले आराम से उड़ाते , अब उन पैसों की कटोती , सबको भारी लग रही थी , मैं और बीवी सुबह सवेरे जॉब पर  निकल जाते , ऐसी में , मेरी बहन , और माँ को मेरे लड़के को देखना होता , जब हम दोनों शाम को लौटते  , मेरी माँ अपनी शिकायतों का पुलिंदा लेकर बैठ जाती ,की तेरे बच्चे को बुढ़ापे में पालने से उसकी मट्टी पलीद हो रही है , उसे अब भी हम लोगो का खाना बनाना पड़ता है , जबकि पूरे  घर का खर्चा मैं उठता  , बहन की पढाई को पैसे अलग देता , वह  सब उन्हें याद ना रहता , बस एक  वक़्त की रोटी बनाने में और एक 2  साल के बच्चे को दूध पिलाने और उसके साथ खेलने में, उनके जैसे दुनिया जहां के काम रूक जाते ...जबकि हकीकत यह थी , जैसी जिन्दगी मेरे घरवाले अब जी रहे थे , ऐसी तो उन्होंने आज तक कभी देखी  भी ना थी ...



सास बहु में आए दिन कभी खाने को लेकर, तो कभी बच्चे पर जंग छिड़ी होती की , उसकी पसंद का नहीं बना या उसने किचन गन्दी कर दी या माँ ने बच्चे को दूध नहीं पिलाया , मेरी माँ और बीवी की रोज रोज की कीच कीच से तंग आकर मैंने एक  नौकर घर में लगा दिया , की वह  लड़के की देखभाल कर लेगा ...पर मामला उससे भी ना सुलझा , नौकर आ गया तो घर में सब जैसे लाट साहब हो गए ,बीवी कहती मेरा काम कर , माँ कहती किचन देख , बाप कहता यह कर , एक  नौकर पर सब मालिक बनकर पिल जाते ...उसका नतीजा यह निकला , दो तीन  महीने में उसने भी हाथ खड़े कर दिए ...



मुझे आजतक यह बात समझ नहीं आई , की जो माँ शादी से पहले अपने बच्चो की रोटी बना कर खिलाने में अपनी ममता समझती है , वही  माँ शादी के बाद ,अपने लड़के की दो रोटी बनाने में अपनी तौहीन  क्यों समझने लगती है  ...



बीवी को तो जैसे मेरी जरुरत ही ना थी , वह  ऑफिस से आते हुए अपनी पेट पूजा करके आती और  घर में ऐसे ड्रामा करती जैसे उसने सुबह से कुछ भी नहीं खाया और कोई उसकी परवाह नहीं करता , उसका यह बहाना करके , घर के छोटे मोटे काम से भी हाथ खींचने का नाटक भर होता , मैं ऑफिस से कब आता , क्या खाता पीता  , उसे इन सबसे कोई मतलब ना था, उसे मतलब था , बस महीने के महीने उसे खर्चने के लिए पैसे मिले और हर दूसरे  तीसरे दिन उसे बाहर घूमता  फिरा दूँ ...



उसकी और मेरी थोड़ी सी मस्ती घर वालो को बड़ी चुभती , मेरी माँ और बहन आए दिन मुझसे उसकी शिकायते करती , घर में चैन से रहना जैसे मुमकिन ही ना था  कभी बीवी और माँ का झगडा तो कभी बाप का बहन से झगड़ा तो कभी माँ बाप का झगडा , होना जरुर था ...मैं क्या सोचकर रीजनल ऑफिस से आया था , लगता था जैसे एक जहन्नुम में चला आया ...



इन सबसे फुर्सत मिलती तो , मेरी माँ मेरा दिमाग खाने चली आती , की मैं बहन की शादी का क्या  कर रहा हूँ , मैंने  तो उसे वचन दिया था , की मैं उसके लिए लड़का देखूंगा ....अभी इन सबसे मैं संभलता की , बीवी ने आकर घर में एक  नया शगुफ़ा  छोड़ दिया , की एक  हफ्ते के अन्दर  उसे अपने ऑफिस के काम से तीन महीनो के लिए इंग्लैंड जाना है ...



लगता था , उसका मेरा उसका थोड़े वक़्त से ज्यादा एक  साथ रहना किस्मत में लिखा ही नहीं था , शादी के वक़्त मैं टूर वाली जॉब में था , शादी के दो महीने बाद ही  कुछ महीनो के लिए यूरोप चला गया , वहां  से आया तो वह प्रेगनेंसी  के कारण कुछ महीनो के लिए मायके चली गई , वापस आई तो , मुझे नौकरी के कारण दुसरे शहरों  में भटकना पड़ा , अब जब मैं वापस आया तो , वह  फिर दूर जा रही थी ...मैंने  खुदा से पुछा , यह आखिर हो क्या रहा है , हम क्या कभी साथ में कुछ वक़्त के लिए रहंगे भी या नहीं ?



पर उस वक़्त मुझे क्या मालुम था , मैं विश डेविल से अपने लिए ख़ुशी नहीं जीवन भर की मुसीबत मांग रहा था ... 



क्रमश :  ............

By 
Kapil Kumar 



Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”
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