Sunday, 3 January 2016

नारी की खोज --- 10


अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 , 3,4 ,5 ,6 ,7 ,8 और 9 में ) ....... की मैंने बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....



गतांक से आगे .......


प्रेम या मोहब्बत क्या है  ? अगर इसकी खोज में निकले तो यह ब्रह्माण्ड  भी शायद कम पड जाए , की किसकी बात सही माने और किसकी गलत ...क्योंकि  प्रेम के अनेक रूप होते है , मानव द्वारा लिखा गया अधिकतर  साहित्य , कविताएं  , गजल और शायरी इत्यादि सब इसी ढाई अक्षर के इर्द गिर्द ही सिमटा पड़ा है ।


फिर नारी से प्रेम या नारी का प्रेम, यह एक  अनुभव करने की चीज है ।  शायद मेरे जीवन में हुए अनुभव भिन्न भिन्न नारी से अलग अलग रूप में हुए ...पर सबमे एक  बात कॉमन थी ...की सबने मेरी भावना को समझा , मुझे सम्मान के साथ प्रेम भी दिया , सिवाय , उसके जिसका यह सामाजिक धर्म था ... आज उम्र के, इस पड़ाव पर पहुँच कर देखता हूँ तो लगता है , आज तक मैंने  अपने प्रेम और  ख़ुशी के बदले जो भी सौदा किया सब घाटे का ही निकला ... जिन जिन रिश्तो की ख़ातिर  मैंने अपनी खुशियों की क़ुरबानी दी , सब जैसे व्यर्थ हो गई , एक  बात निर्विवादित  रूप से सच है की ..जीवन में ...


कोई किसी का इंतजार नहीं करता और ना ही कोई किसी की वफ़ा का ऐतबार करता है ।  लोगो की याददाश्त बहुत ही कमजोर होती है या अधिकतर रिश्ते सिर्फ मतलब और झूठ की बुनियाद पर अपने वक़्त की ज़रुरत  पूरा करने के लिए सिर्फ टिके भर होते है ....


लता बिस्तर से इस तेजी से निकल कर भागी थी कि एक  बार को, मुझे लगा की, मैं जैसे सपने से जाग गया हूँ ...क्योकि इतने दिन,किसी को जानने के बाद, उसका यूँ अचानक से करीब आना और नजदीक आकर हाथ से मछली की तरह फिसला जाना , अपने आप में ही एक अनुभव था...


उस दिन से ,लता ने... मेरे घर आने का समय बदल लिया , अगले दिन वह  सुबह सवेरे काम करने आ गई और चुपचाप काम करके चली गई ।  उसने मुंह  से एक शब्द भी नहीं कहा और ना ही मेरी तरफ देखा , मैं भी नींद में उंघा पड़ा था ।  मुझे उसके इतनी जल्दी आने का अंदेशा ना था , इसलिए किसी भी तरह से तैयार ना था ,मुझे उसके इस बदले व्यवहार  से बहुत हैरानी हुई , फिर मैंने मन में सोचा, शायद वह  उसका , एक  दिन का भावनाओं का बहाव रहा होगा ...


मेरा कमरा, मकान में सबसे ऊपर था और सर्दियों में वैसे भी दोपहर से पहले कोई छत पर झाँकने  आता नहीं था ।  इसलिए मैं अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद करके नहीं सोता था , मेरे पास ऐसा कुछ ना था , की कोई उसे चुरा ले , पर्स में कुछ पैसे , घडी , एक  सेल फोन और कुछ कपडे ...हाँ सेल फोन जरुर मुझे हिफ़ाजत  से रखना होता था ...


उस वक़्त, राज्य में सिर्फ मुझ जैसे कुछ टेक्निकल लोगों के पास ही सेल फोन होता था ।  आम जनता ने तो इसे शायद दिल्ली या मुंबई में देखा भर था .....क्योकि जिस कम्पनी के लिए मैं काम करता था , उसने ही प्रदेश में सबसे पहले, सेल फोन सेवा चालू करने का सरकार से लाइसेंस लिया था और उसी के सिलसिले में ,मै हेड ऑफिस द्वारा राज्य में मोबाइल सर्विस लांच करने के लिए , कम्पनी के ब्रांच ऑफिस में फोन एक्सचेंज का काम देखने आया था...


करियर में वह  मेरा सुनहरा दौर था ।  उस वक़्त मोबाइल कंपनी में काम करना , करियर के लिए एक  बहुत बड़ा टर्निंग पॉइंट था , उन दिनों नौकरी में मुझे एक  अच्छी खासी तनख्वा के अलावा , टूर अलाउंस और हर वक़्त के लिए ड्राईवर वाली कार भी मिली हुई थी.....


फिर भी मैं, हर दूसरे  हफ्ते दो दिनों के लिए अपने घर चला जाता था ।  तब घर वाले और बीवी अपनी शिकायतों  और शिकवों  की पोटली लेकर बैठ जाते कि की मेरे ना होने से उन्हें कितनी परेशानी हो रही है ।  पर मेरी जेब से निकलते नोटों की खुशबु , उनकी हर परेशानी और जरुरत का ऐसा हल बनती की कोई उसके बाद कुछ ना बोल पाता ।  मैं जब भी घर जाता , घर वालो को उनकी जरूरत से ज्यादा ही देकर आता .... मैं जब भी वापस आता, मेरा लड़का, जो उस वक़्त उम्र में साल या डेढ़ साल का होगा , मुझे जाते देख बहुत रोता ... उसे यूँ रोता हुआ छोड़ते वक़्त मुझे बहुत बुरा लगता , पर मेरी भी मज़बूरी थी....


मेरी नौकरी की यही शान देख कर, मेरा पुराना मकान मालिक, मेरे पीछे अपनी लड़की लेकर पड़ा था , जिससे मैंने  उसका मकान छोड़ कर अपना पीछा छुड़ाया ... नया मकान मालिक और अड़ोसी पडोसी  , सब मुझसे बहुत ही संभल कर बात करते थे...


लता के सुबह सुबह आने से, अब मेरी नींद ख़राब होने लगी थी ,मैं रोज सुबह इस चक्कर में उठता की वह  बिस्तर पर आएगी , पर वह , काम करके तुरंत फुर्र हो जाती ...जब दो तीन दिन ऐसे बीत गए तो मैंने  भी सोचा , लगता है यहां , अब दाल ज्यादा  देर नहीं गलेगी .....


शनिवार का दिन था , उस दिन मैं ऑफिस दोपहर में, सिर्फ नाम के लिए जाता था ..मैं नींद में ऊंघ रहा था । मैंने  घडी देखी  की सुबह के 10  बज चुके थे , पर लता अभी तक काम करने नहीं आई थी ।  मुझे लगा , लगता है शायद आज छुट्टी मार ली हो ।  मुझे उसके आने या ना आने से कोई फर्क नहीं पड़ता था , वैसे भी मेरा कमरा ज्यादा गन्दा नहीं होता था और बर्तन मेरे पास इतने थे की हफ्ते भर भी ना धुलते, फिर भी मेरा काम हो जाता ....


अचानक से, कमरे का दरवाजा खुला और किसी सस्ते से पाउडर की खुशबु  का झोका मेरे कमरे में घुस आया । मैंने एक आँख खोलकर देखा तो , लता कमरे में आई हुई थी ...आज उसने एक  साफ़ सुथरी साड़ी पहनी थी और लगता था, घर से नहा  धोकर आई थी ...उसने जल्दी जल्दी झाड़ू लगाई और कुछ बचे खुचे  बर्तन धोने बैठ गई ।  तभी मैं भी उठा और बाथरूम में ब्रश करने चला गया और वहां  से हाथ मुँह  धो बिस्तर पर आकर बैठ गया ...मेरे बाथरूम से निकलने के बाद , उसने वहां  का रूख किया और कपडे धोने बैठ गई , जब तक उसने कपडे धोकर सुखाये , मैंने अपने लिए चाय बना ली ,अभी मैं, चाय ख़त्म करके बिस्तर पर आकर लेटा ही था ... तभी बाहर  से कपडे सुखाने के बाद , लता कमरे में आई और दरवाजे पर कुण्डी  लगा कर, बिस्तर पर मेरे बराबर में आकर लेट गई ...


मुझे उसकी इस हरकत पर हैरानी के साथ एक  ख़ुशी सी हुई , उसने अपने ठन्डे ठन्डे हाथ मेरे गाल पर लगाये और फिर अपने एक  हाथ को मेरे कुर्ते  के अंदर डाल दिया और मेरी छाती को सहलाने लगी .... उसके बर्फ जैसे हाथ को मैंने  अपने गर्म गर्म गाल पर किसी तरह से बर्दाश्त कर लिया , पर छाती पर  घूमता उसका ठंडा हाथ मुझे करंट जैसा लगा ....वह  फुसफुसाते हुए बोली , आजकल बहुत ठण्ड हो गई है और ऐसा कह उसने अपना ठंडा ठंडा बदन ,मेरे गर्म बदन से चिपका लिया ...बाहर  ठंडी हवा, सांय सांय करके चल रही थी और कमरे के अंदर उसकी सांसो से निकलती गर्म हवा मेरे चेहरे को छू  रही थी ...


मैंने  उसके हाथ को ,अपने कुर्ते  से बाहर निकाला और उसके ऊपर लेट गया , वह  भी किसी पेड़ की लता की तरह मुझसे लिपट गई , जैसे कोई अमर बेल किसी पेड़ का सहारा पाकर उसपर  अपनी जकड़ बना ले ... आज मैंने  उसके होठों को चूमने की गलती नहीं की ।  मेरा पहला अनुभव, मेरा मुँह  कसैला कर चूका था ।,मुझे होठों को चूमता न देख , वह  जैसे मेरे मन के भाव को समझ गई और मेरी तरफ मुस्कुराते हुए देखने लगी ....मैंने  उससे पुछा ,क्या तुम बीडी या सिगरेट पीती हो ?


उसने हँसते हुए कहा नहीं तो , फिर बोली... वह  क्या है मैं दातुन करती हूँ , शायद उसकी गंध होगी , आज मेने तुम्हारे लिए मंजन किया है ....फिर भी मैंने  उसके होठों से अपनी दूरी  बना कर रखी ,आज मेरा ध्यान उसकी नाभि और और छाती पर था... जैसे ही मैंने  उसके ब्लाउज को आगे से ऊपर करना चाहा ,तो वह बोली अरे तुमसे हुक टूट जायेगा, लो में कर देती हूँ और ऐसा कह उसने खुद अपने आप अपना ब्लाउज और ब्रेसियर  अलग करके बिस्तर के नीचे रख दिया....


जब पहली बार मैंने  उसे बिस्तर पर गले लगाया था , तब उसके शरीर से, एक  अजीब किस्म की बदबू आई थी , जैसी किसी पोछे वाले कपडे को छूने  के बाद हाथ से आती है...आज वह  बदबू उसके शरीर से बहुत हल्की  सी आ रही थी....शायद उस दिन उसे, मेरे मन की वितृष्णा  , मेरे बिना कहे ही पता चल गई थी.....आज उसने मेरी भावनाओ का ख्याल रखते हुए, मुँह  मंजन से और शरीर रगड़ कर धोया था , साथ में पुरे जिस्म और चेहरे पर हल्का फुल्का पाउडर भी  लगाया था ... इतना करने के बाद भी , वह  मेरे लिए, प्यास बुझाने का एक  गन्दा सा तालाब भर थी , जिसका पानी साफ़ होते हुए भी पी कर तृप्ति करने लायक कदापि ना था , फिर भी उससे मैं, अपने योवन की प्यास बुझाने के लिए बेताब या मजबूर था ....


अब वह , मेरे सामने अर्द्धनग्न  स्थिति में थी , आज उसके गालों से लेकर उसकी नाभि को मैंने  जी भरकर चूमा और उसके उरोज़ों  और निप्पल को मन मर्जी से उमेठा .... चूमने और चूसने लायक कसाव और उठाव उनमे ना था ...वह  ऐसे लगते थे जैसे बिना गुठली का पोपला आम, जिसके ऊपर एक  पिचकी हुई किसमिस चिपका दी गई हो ... वोह आँखे बंद किये उन सबका आन्नद ऐसे लेने लगी, जैसे वह , कोई मीठा सपना देख रही हो ....गंदे तालाब से जी भरकर पानी पीने के बाद , अब मेरी ,उसमे पूरी तरह से डुबकी लगाने की इच्छा हो रही थी ... इसी चूमा चाटी में ,पता नहीं कब उसकी साडी खुल कर बिस्तर में हम दोनों के नीचे कहीं  दब चुकी थी , उसके शरीर पर कपड़ो के नाम पर सिर्फ एक  पेटीकोट शेष बचा था ...


मुझे मेरी मंजिल सामने दिखलाई दे रही थी , मैंने आनन फानन  में अपना कुर्ता  और बनियान उतार फेंका ।  मैं अभी पजामे का नाडा खोलने ही वाला था की , उसने मेरा हाथ पकड लिया और बोली ...***इसे काबू में रखो**** , जिस भाषा में वह  बोली ,उसे सुन ,मेरा दिमाग घूम गया ..आज से पहले मैंने ,वह  भाषा, सिर्फ मस्तराम की किताब के कुछ पन्नो में पढ़ी थी ...


अचानक उसने, अपनी टांगो की एक  कैंची सी बना कर, मेरी दोनों टांगो को क्रॉस करके उनके अन्दर फंसा लिया और अपने दोनों हाथो को मेरे गले में, हार जैसा एक  फंदा बना कर, ऐसे डाल लिया, की , उसके शरीर की गिरफ्त में फंसा , मैं ऐसे लग रहा था , जैसे किसी अजगर ने, किसी शेर को अपने अन्दर लपेट लिया हो... अब मैं चाह कर भी, अपनी जगह से ज्यादा हिलडुल नहीं सकता था...


आज से पहले, ऐसी स्थिति, मेने कुश्ती करते हुए दो पहलवानों के बीच या लड़कपन  में जब मैंने  जुडो सीखी तब देखी थी ।  इसमे एक  तरह का एक ग्रिप लॉक होता है , जिसमे फंस कर सामने वाला बेबस हो जाता है ... इस स्थिति में मुझे बेबस देख कर, वह  हंसने लगी और मेरे गालो और छाती को बेतरबी से चूमने लगी .....


मैं भी उसकी गिरफ्त में फंसा हुआ उसकी इस हरकत का मजा लेने लगा ... अगर मैं चाहता तो उसकी गिरफ्त से अपने को आजाद करा सकता था , पर उसमे मुझे थोड़ी बहुत जोर आजमाइश करनी पड़ती और ऐसा करने से, मेरा मासूम फोल्डिंग पलंग जरुर शहीद होजाता .... पहले ही उसपे दो लोगो का बोझ थोडा ज्यादा था ...जब उसकी गिरफ्त थोड़ी ढीली हुई , मैं भी जोश में, उसके उरोजो को बेतरबी से काटने और मसलने लगा ......अब उसके मुँह  से जोर जोर की मीठी सी सिसकियाँ निकलने लगी .....कभी कभी उसे मुंह  से “हाय री दइया” निकल आता था .... उसकी यह हालत देख ,मुझे लगा की लोहा अब गर्म हो चूका है , अब इसपे चोट करना सही रहेगा , इसलिए मैंने  मौका देख उसके पेटीकोट के अंदर हाथ डाल दिया ....


मेरा हाथ डालना था , की वह एक  गुर्राती हुइ शेरनी की तरह सतर्क हो गई और मेरा हाथ खींच  कर बाहर  निकाल दिया और उसे कस कर पकड लिया , फिर मस्तराम वाली भाषा में बोली, “अपने **इसको” काबू में रखो , वरना यहीं  काट दूंगी , फिर मेरे पजामे को घूरती हुई बोली , तुम्हारा “**वोह” बहुत जल्दी अकड़ कर, पानी छोड़ने लगता है .... उसके मुँह  से, वह  सब बाते मेरे कानो में एक  गर्म गर्म पिघले शीशे की भांति उतरने लगी ...जिसे मैं शब्दों में कह भी नहीं  सकता ....उस दिन मुझे पता चला की मस्तराम किसने और किसके लिए लिखा होगा ...


वह  उसकी भाषा थी , पर मेरे लिए, किसी नारी की ऐसी भाषा , मेरे जैसे प्रेम पथिक के मन को विचलित करने वाली थी ..सेक्स में हलकी फुलकी छीना झपटी , नोच खसोट और धक्का मुक्की तो मुझे मंजूर थी , पर उसकी निम्न स्तर की भाषा ने मेरे अरमानो को एक  दम ऐसे ठंडा कर दिया , जैसे उबलते दूध पर  किसी ने ढेर सारा ठंडा पानी उड़ेल दिया हो ...


मैंने  उसके जिस्म से अपनी पकड ढीली कर दी , अब वह  मुझे एक  औरत न लगकर , सेक्स बेचने की ,गन्दी सी बाजारू ठेली भर लग रही थी ...जिसपर मैंने  भूख में, कुछ खाने का मन तो बना लिया था परन्तु अब असमंजस में था की खाऊँ की न खाऊं  , उस दिन मैंने  जाना की...


इन्सान क्रोध , नशे और सेक्स के आवेश में ही अपना असली चेहरा,पहचान और चरित्र दिखलाता है ..


मुझे सेक्स और प्रेम में, एक  हद के बाद, जो आजमाइश है वह मुझे अच्छी नहीं लगती , इसलिए जब उसने मेरे हाथ को कसकर पकड लिया , फिर मैंने  उसे पाने का ख्याल त्याग दिया , सोचा जब इसे... खुद जरूरत  होगी , तब यह खुद पहल करेगी , वैसे भी उसकी भाषा सुनने के बाद , उससे मुँह  जोरी करना और बिस्तर पर नुरा कुश्ती करना मुझे अच्छा ना लगा ...


थोड़ी देर की लिपटा चिपटी के बाद उसने अपनी साडी पहनी और बोली ,चलो मैं चाय बना दूँ .... यूँ तो मैं चाय पहले ही पी चूका था , मैंने  उसे कोई जवाब ना दिया ,चाय बनाते वक़्त उसने मुझसे अपनी मस्तराम टाइप भाषा में कुछ बातें  की , जो शायद वोह अपनी पति से करती , सुनती और कहती होगी ... जिसे मैंने  बड़े अनमने से मन से सुना , मेरा जोश, उसे लेकर अब पूरी तरह से ठंडा पड़ चूका था .....


उसकी बनाई हुई चाय की , जैसे ही मैंने एक  चुस्की ली ,तो पूरा का पूरा मुह अजीब सा कैसेला हो गया , मेरी और उसकी चाय की पसंद एकदम  अलग थी ,चाय निहायत ही मीठी और चाय पत्ती से भरपूर एक  दम काली सी थी... फिर भी मैंने उसके सामने एक दो घूंट पिए और कप को बिस्तर के नीचे  सरका दिया ...चाय ख़त्म करके , उसने एक मुस्कराहट  मुझपे डाली और कमरे से बहार निकल गई ....


उस दिन के बाद से, उसके और मेरे बीच एक  अघोषित सा समझौता हो गया ,की सोम से शुक्र वह  सुबह सुबह आती और चुपचाप काम करके चली जाती ... शनि और रविवार को काम निबटाने के बाद ,वह कुछ देर मेरे साथ बिस्तर पर गुजारती... वह  मेरी पसंद न थी पर शरीर की वक्ती तौर पर एक  जरूरत जरुर थी , उस गंदे तलाब में नहाने की ,मैंने  अपनी तरफ से बहुत कोशिश  की , किसी तरह उसमें पूरी डुबकी लगा लूँ , पर मेरी सारी कोशिशें  नाकाम हुई ...


उसने अपनी सीमा की एक  लक्ष्मण रेखा खिंची हुई थी , जिससे आगे उसे कभी बढ़ना ही ना था .... मैं जब कभी उसके साथ बिस्तर पर चिपक कर लेटा हुआ होता , तो रोनी की बीवी के साथ हुई घटना याद आ जाती , की कैसे, उस वक़्त मैं उसके शरीर की गर्मी से, कुछ ही मिनटों में मक्खन की तरह से पिघल गया था और अब लता से घंटा भर चिपके रहने के बाद भी , मैं अपने ऊपर काबू रख सकता था , कितनी अजीब बात थी ...


जब मुझे घुड़सवारी नहीं आती थी , तब मुझे घोड़ी अपने ऊपर चढाने के लिए तैयार थी और अब, जब मैं मंझा हुआ घुड़सवार था , घोड़ी को सिर्फ दाना खिलाने , उसपे नकेल चढाने और उसकी पीठ सहलाने तक सिमित था ....


कुछ ही दिनो में, वह  मेरा कमरा ऐसे समझती जैसे उसका घर हो , जब उसकी मर्जी होती चाय बनाती और पीती , शुरू शुरू में तो वह  मेरे लिए भी बनाती , जब उसे लगा की मुझे उसके हाथ की चाय पसंद नहीं तो उसने मेरे लिए बनानी बंद कर दी ... वह अक्सर मेरे लिए खाना बनाने की जिद करती , जिसे मैं हंस कर टाल देता ... तब वह  मुझे उलाहने देती और कहती .... अच्छा मैं नीचे  तबके की हूँ इसलिए मेरे हाथ का खाना नहीं खाना चाहते ....


जबकि सच्चाई यह थी , अक्सर उसके बदन से,पोछे के गंदे कपडे जैसी बदबू आती थी , जिस्मानी जरुरत के लिए उसे सहना एक  बात थी ...पर उसके हाथ का बना खाना खाना दूसरी बात , वैसे भी मैं , किसी ठेले या सडक छाप दुकानों से कभी खाता नहीं था ...बस एक चाय ही इसका अपवाद थी , जिसे मैं, किसी भी खोखे या सडक की दुकान से पी लेता था .....


मेरे लिए सेक्स भी उसी चाय की प्याली की तरह था , जिसके लिए मैं अपने आदर्शो की क़ुरबानी एक  हद तक ही दे सकता था ...


फिर भी वह , अपनी तरफ से कोशिस करती थी , की मेरे लिए अच्छे से सजधज सके और साफ सुथरी बनकर रहे ...पर उसका काम ही ऐसा था , जिसमे शायद यह सब मुमकिन ना था , फिर भी ठण्ड की उन सर्द हवाओं  के बीच , उसके जिस्म की गर्मी , ऐसे थी जैसे रेगिस्तान में भटकते प्यासे पथिक के लिए पानी की दो बूंद ....जिसे होठो पर लगाने से ,सिर्फ पानी होने का अहसास भर किया जा सकता था , पर उससे प्यास नहीं बुझाई जा सकती थी ....


मैंने  उसे कई बार कहा , तेरे लिए मैं अच्छे कपडे खरीद कर दे देता हूँ , पर वह मुस्करा कर कहती , हाँ , वह  भी लुंगी , दिवाली पर , मैं तुमसे इक अच्छी सी साडी लूंगी  .... मैं हैरान होता और पूछता दिवाली पर ही क्यों ? उसका जवाब होता... बस दिवाली पर  ही ....शायद उसका रिश्ता मुझसे जिस्म से ज्यादा किसी मानसिक सहारे का था ....जिसके बदले वह  मुझे अपना थोडा सा जिस्म दे देती थी या उस वक़्त उसके अन्दर की कामवाली बाई जाग जाती थी ...


हमारे शारीरक मिलन का यह सिलसिला सिर्फ कुछ ही दिन चल पाया , कि एक  रीजनल  ऑफिस से कंपनी के सी. ई. ओ का फोन आया , की मुझे अगले ही दिन से रीजनल ऑफिस में आकर काम देखना है और मेरी पोस्टिंग कुछ महीनो के लिए वहां  कर दी गई है .....हमारा रीजनल ऑफिस , उस शहर से करीब २  घंटे की दूरी पर  था ...इसलिए मुझे अब, यह शहर हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर जाना था ....


शनिवार का दिन था , नहा धोकर मैंने  अपना थोडा बहुत सामान, जो कमरे में इधर उधर फैला हुआ था , इकठ्ठा  करके बांध रहा था ... अभी मैं सामान बांध ही रहा था , की  लता कमरे में आई , उसने हैरानी से पुछा , यह सब क्या है ? वह  शायद महीने का पहला हफ्ता था ,कुछ दिन पहले ही मैं उसे पिछले महीने का पैसा दे चूका , फिर भी मैंने , पुरे महीने के पैसे निकाल कर उसके हाथ पर  रख दिए और बोला , मैं इस शहर को छोड़ कर , हमेशा के लिए जा रहा हूँ , मेरा यहां  से ट्रान्सफर हो गया है ... मेरी यह बात सुन, लता अपनी जगह जड़ सी हो गई , वह  मुझसे लिपट कर रोने लगी और बोली , अब मेरा क्या होगा ?


उसके यह कहने से मैं चोंका , मैं बोला , इसका क्या मतलब ? वह  रोते हुए बोली , मैं तुम्हारे बिना ना रह पाउंगी ....अब हैरान होने की बारी मेरी थी , मैं हिकारत भरे स्वर में बोला , तूने तो मुझे कुछ करने ही नहीं दिया , फिर किस हक़ से तू यह बात कह रही है ? उसने रोते हुए मेरे पांव पकड लिए और बोली , जन्हा भी तुम जाओगे मुझे अपने साथ ले जाओ ? मैं तुम्हारी दिन रात सेवा करुँगी , जैसे भी रखोगे वैसे रहूंगी , मैं एक  नौकरानी बन कर भी तुम्हारे साथ खुश रहूंगी ...


मैंने  उसे अपने से अलग करते हुए कहा , क्या बात करती है , तेरे तो तीन बच्चे है , फिर मेरा तेरा क्या रिश्ता ? बस कुछ ही बार तो तू मुझसे लिपटी भर है ... वह  मेरे गले लग गई और बोली , मैं तुम्हारे लिए अपने बच्चो को भी छोड़ दूंगी, मेरी सास उन्हें पाल लेगी, पर तुम्हारे बिना अब मैं जी नहीं सकती ....


मैंने  उसे अपने से अलग किया और अपना सामान बाँधने लगा ,वह  मुझे बेबस आँखों से देखती रही , सामान मेरे पास ज्यादा न था । मैंने  सामान को छत से नीचे  उतारने के लिए कमरे के बाहर  रख दिया .... की लता मेरे पास आई और बोली , क्या तुम सारा सामान अपने साथ ले जाओगे ?


मैं बोला , तुझे जो चाहिए वह  ले ले ,अब उसकी आँखों से आंसू गायब थे , अब एक  काम वाली बाई जैसे बात कर रही थी .... उसने बर्तन , खाने का सारा सामान , बाल्टी आदि अपने लिए रख लिया , मुझे वह  सब देने में कोई आपत्ति नहीं थी , वैसे भी मैं, उन्हें अपने साथ लेकर कंहा जाता , मेरा इरादा उसे ही वह  सब देने का था , क्योकि रीजनल ऑफिस में , मैं घर किराये पर ना लेकर , होटल में रहने वाला था , इसलिए वह सारा  सामान मेरे लिए अब बेकार ही था ....


सर्दियों के दिन थे , उस वक़्त मैंने  सर्दी से बचने के लिए एक गर्म चादर ओढ़ रखी थी , जब मैं, कमरे से चलने लगा तो लता ने कहा , यह चादर मुझे दे दो , मैंने  उसे वह  देने से मना कर दिया , उसने मुझसे कई बार उसकी मांग की और अपनी तरफ से, उसे खींचने की बहुत कोशिस भी की, पर मैंने  भी उसे अपने बदन से अलग नहीं किया ... इससे पहले , ना जाने कितनी बार मैंने  उसे साडी , सलवार सूट आदि खरीदकर लाने के लिए बोला , जो उसने कभी नहीं लिया था , पर आज एक  आम सी चादर को मैंने  मना कर दिया , शायद मैं भी उसकी धीटता का जवाब, अपनी धीटता से दे रहा था या उसके पेटीकोट को ना हटा पाने का बदला अपनी चादर से दे रहा था ....


आज मैं गंदे तालाब से दूर , एक  ऐसे गुलिस्तां में जा रहा था , जहां  आने वाले दिनों में एक  सुन्दर गुलाब का फूल, मेरी बगिया में खिलने के लिए बेताब था ... फिर भी मैंने , अपने चमकते करियर और महकते फूल को ,अपने सामाजिक  रिश्तों  और कर्तव्य की वेदी पर बलि चढ़ा दिया ....


क्रमश :  ...........


 By 

Kapil Kumar 

Note: “Opinions expressed are those of the authors, and are not official statements. Resemblance to any person, incident or place is purely coincidental.' ”



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