Tuesday, 29 December 2015

नारी की खोज --- 9





अभी तक आपने पढ़ा (नारी की खोज भाग –1 , 2 , 3,4 ,5 ,6 ,7 और 8 में ) ...की मैंने  बचपन से आज तक नारी के भिन्न भिन्न रूपों को देखा .......मेरे इस सफर की आगे की कहानी.....



गतांक से आगे .......


इन्सान का चरित्र क्या है  ? अगर इसकी परिभाषा  पूछी जाए तो शायद दुनिया जहां  के लोग इसे सब मिलती जुलती सी बताये , पर जब उसके मापदंड पूछे जाये तो वह  समय , काल , स्थान , परिवेश , धर्म और समुदाय में अलग अलग हो जाते है  ...जैसे किसी विशेष धर्म में एक  से ज्यादा शादी स्वीकृत है , पर दुसरे धर्मो में यह अधर्म है , पाश्चात्य सभ्यता में शादी से पहले किसी के साथ सम्बन्ध स्वीकार्य है , पर भारतीय  समाज में इसे आसानी से हज़म  नहीं किया जाता ।  ऐसे ही किसी विशेष स्थान पर  आप किसी वेश्या के साथ सो सकते है , पर उसी देश में , उसी शहर में , दुसरे स्थान पर यह गैर कानूनी बन जाता है । ...किसी समय में नारी को गुलाम बना कर रखना और उसका शारीरक शोषण करना अपने समय में बहुत सारी सभ्यताओ में स्वीकार्य था ...पर अब ऐसा सोचना भी गुनाह है , ऐसे ही कुछ बाते जो किसी के सामने बोलने पर एक  साधारण तो दुसरे के सामने बोलने पर वे  हमें कुछ और समझ लेते है .... कहने का तात्पर्य यह है , चरित्र की परिभाषा तो वही रहती है ...पर उसका बदलता पैमाना आपको चरित्रहीन  बनाने के लिए काफी होता है ....



अन्जाने  शहर में ,अकेला , तन्हा  , मैं अपनी जिन्दगी गुजर बसर कर रहा था ।  यूँ तो मैंने अपनी यौवन  की जरूरतों को पूरा करने के लिए , अपने आस पास की जवान होती बालाओं पर अपने तरकश के तीर चलाये , पर सब बेकार गए   उनमें  से किसी ने भी मुझे भाव ना दिया , शायद मेरी ढलती जवानी का तकाजा था या मैं शिकार करना भूल चूका था ....


मेरी हालत उस शेर की तरह थी जिसका प्राइम समय ढलान पर था , जवानी अपना दामन छुड़ाने के लिए बेताब, तो , अधेड़ अवस्था अपने आगोश में लेने के लिए बेक़रार थी .. ऐसे में ,मेरे जैसे सिंह को अब तेज दौड़ती हिरनियो का शिकार सिर्फ निराशा और अवसाद के और कुछ ना दे रहा था ... मैंने  भी प्रकृति के नियम को समझा , की शेर अपना प्राइम समय जीने के बाद , दूसरे  जानवर के किये शिकार को छीन  कर  खाने  या फिर उनके खाने के बाद बचा खुचा  खाने  या फिर बीमार अपाहिज़  जानवर का शिकार करने को मजबूर होता है ....ऐसा करना उसकी मज़बूरी है , ख़ुशी या गर्व की बात नहीं .....


ऐसे ही हम कुछ लाचार , बेज़ार  शेर अपना समय सेक्स की अज़ीबों  गरीब बातें करके गुज़ार  लेते थे... मेरी उन बातों  से , खाते पीते शेर , जो अपने घर परिवार और बीवी बच्चो  के साथ रहते थे हमें चरित्रहीन की उपाधि से  गाहे बगाहे से वशीभूत कर देते ...कुछ नए नए जवान हुए शेर , जिन्हें अभी तक  शिकार करने का मौका ना मिला था , हमारी बातों  से अपना दिला बहला लेते ...


ऐसे ही , मेरे साथ काम करने वाले एक  लड़के की नयी नयी शादी हुई , उसे मेरी बातों में बड़ी दिलचस्पी होती ।  एक  दिन मुझे अकेला देख , उसने मुझसे सेक्स के बारे में कुछ इधर उधर के सवाल किये , जो सुनने में बड़े  अटपटे से थे  ।  फिर भी मैंने  समय काटने के लिए उनपर जोक्स  उसे सुना दिए ...अचानक मैंने उससे पुछा तो बता तेरी नयी नयी शादी के दिन कैसे कट रहे है ?


मेरी बात सुन वह  थोडा सीरियस हो गया और मेरी तरफ मुस्कुराते हुए बोला , अगर किसी को ना बोलो तो एक  बात पूछूँ ? उसके इस तरह सवाल पूछने से मेरे कान खड़े हो गए , मैं बोला , क्या समस्या है ? क्या सुहागरात में मजा नहीं आया ?


मेरी बात सुन , उसने कहा ...अभी तक सुहागरात बनी ही नहीं , अब चौंकने  की बारी मेरी थी ।  मैं बोला , अबे तेरी शादी को तो 10 /15  दिन से ऊपर हो गए , तू अब तक क्या कर रहा था ?

उसने मुझे गहरी नज़रों  से देखा औए एक  गहरी सांस ली ।  बोला एक  समस्या है ..मैंने  भी अधीर होते हुए पुछा , अब क्या हुआ ?


वह  बोला मेरी लाख कोशिसों  के बावजूद , मैं अन्दर नहीं डाल पाया , मैंने तो लुब्रिकेंट तक लगा कर देख लिया !  बताओ अब क्या करू ?  मुझे तो अब बीवी का सामना करते शर्म आती है ? मैं हंसा और बोला , बेटा इसमें शर्म की नहीं गर्व की बात है , मेरी बात सुन वह चौंक  पड़ा और बोला कैसे ?


मैंने  उसे समझाया , देख तुम्हारा नाकामयाब होना इस बात का पुख्ता सबूत है , की तू और तेरी बीवी दोनों वर्जिन हो ...अगर एक  भी पुराना उस्ताद होता , तो तेरा काम अब तक हो गया होता ...


उसने अधीर होते हुए कहा , पर अब मैं क्या करूँ ? ..मैं बोला सब्र कर , सब समझा दूंगा , .. देख भाई यह ऐसा है , यहाँ  घोड़ी और घुड़सवार दोनों अनाड़ी है... तू भी अनाड़ी और तेरी बीवी भी ... अब घोड़ी भी अनाड़ी हो और घुड़सवार भी तो , घोड़ी भी इधर उधर दौड़ेगी और घुड़सवार भी गिरेगा ....या तो घोड़ी सीखी  सिखाई हो , जो घुड़सवार को अपनी पीठ पे लाद ले या फिर घुड़सवार मंझा हुआ खिलाडी हो , जो घोड़ी पर नकेल डाल ले , पर तुम दोनों के केस में तो ऐसा है नहीं ?


उसने खीजते हुए पुछा तो इसका हल क्या है ? मैं बोला , भाई ऐसा है , प्रकृति ने नारी को  उसका जननांग  ऐसी जगह लगाया है , जहां बिना उसकी मर्जी के , कोई माई का लाल उसे हासिल नहीं कर सकता ....

इसलिए तुझे उसका सहयोग लेना ही पड़ेगा ..तू ऐसा कर अपना काम शुरू करने से अच्छे से वहां  लुब्रिकेंट लगा और फिर उसकी पीठ के नीचे तकिया लगा देना , फिर उसको बोलना की अपनी टाँगे जितनी हो सके अलग अलग दिशा में  फैला दे , तब तेरा काम बन जाएगा , अगर तब भी ना बने तो तकिये को उसके नितम्ब के बिल्कुल नीचे लगा देना , एक  दो बार की कोशिस में तेरा काम शर्तिया बन जाएगा ....


उसने मेरी बात को बड़े ध्यान से सुना और कई बार खोद खोद कर अपने सारे शक दूर किये ।  मैंने  भी अपने पुराने वक़्त को याद करते हुए उसे एक  से एक  बढ़िया टिप दिए ...

बात आई गई हो गई , मैं भी  अपने काम में वयस्त हो गया ,कुछ दिन मेरा और उसका सामना ना हुआ  ..एक  दिन जब वह  दिखलाई दिया तो मेरी उत्सुकता जगी की , उसका क्या हुआ ? मैंने  जैसे ही उससे पुछा तो भाई कैसा रहा , उसने नज़रें  फेर ली और हँसते हुए बोला , मुझे इस विषय पर बात नहीं करनी और ऐसा  कह वह  वहां से खिसक लिया ..... उसकी चाल बता रही थी , की उसने किला फतह कर लिया था ....

कुछ दिनों में , किसी के मुँह   से सुनने में आया , की वह  मेरे चरित्र का सर्टिफिकेट दूसरे  लोगो को दे रहा था .... ....मुझे उसके इस रवैये  से ना तो हैरानी थी , ना ही शिकायत , क्योकि किसी मर्द के लिए औरत को न भोग पाने की  नाकामी उसकी समाज और खुद की नज़रों  में सबसे ज्यादा शर्मनाक  होती है .... कितनी अजीब बात है ....


समाज में नारी , मर्द की इज्जत दोनों हो स्थितियों  में उछाल देती है , अगर वह  सेक्स के बारे में ज्यादा जाने तो चरित्रहीन और अगर ना जाने तो अनाड़ी गधा ....


जिस घर में  मैंने  कमरा  किराये पर  ले रखा था .. उसी घर में मेरे वाले फ्लोर पर  ,मेरे कमरे से सटा एक  दो बेड रूम का सेट और था .... जिसमे एक  मियां बीवी अपने दो बच्चों  के साथ रहते ....वैसे तो मैं अधिकतर खाना बाहर  ही खाता , पर सुबह की चाय घर पर बनाता और कभी कभी मन होता तो ब्रेड आमलेट भी बना लेता ... यूँ तो मैं घर में रहता ही बमुश्किल था और अपने  कपडे किसी प्रेस करने वाले से धुलवाता , फिर भी अंडरवियर बनियान और कुछ बर्तन मुझे धोने होते थे ....उन्ही की जिद्द पर मैंने  उनकी काम वाली बाई को अपने यहां लगा लिया ...की मैं इस उम्र में , मैं खुद कपडे , बर्तन और पोछा करता अच्छा नहीं लगता .....


खैर  कामवाली बाई आती और अपना काम करके रोज चली जाती , कई दिनों तक मैंने   उसकी सुरत भी ढंग से न देखी  .... एक  दिन सीढियों पर चढ़ते हुए मैंने एक  औरत को अपने कमरे से निकलते देखा तो चौंका , मैंने पूछा  तुम कौन हो ?  उसने हँसते हुए कहा , अरे मैं "लता"  ! जो आपके यहाँ काम करती है ...मैंने  आज उसे पहली बार गौर से देखा ,वह 30 /35 साल  की गेहुंए  रंग की मझले से कद की भरी पूरी , अच्छे नाक नक्श वाली एक  हंसमुख औरत थी ...जो देखने में आम कामवाली बाई जैसी कदापि नहीं लगती थी ...उसके कपडे साफ़ सुथरे और चेहरे पर एक  रौनक   थी उसे मेरी बात पर इतनी हंसी आई , की उसने यह बात सब अड़ोस पड़ोस  में बता दी ...की मैं  अपनी धून में कितना खोया रहता हूँ ...


असल में उसके आने का टाइम जब होता तब मैं ऑफिस में होता ,वह  आती और अपना काम करके चली जाती ।  उसे मेरे कमरे का दरवाजा हमेशा खुला मिलता ,क्योकि मेरे पड़ोस वाली फॅमिली और मेरा आने जाने का एक  दरवाजा कॉमन था  । वैसे भी मैं  अपने कमरे पर  कभी ताला  लगाता ही नहीं था .....क्योकि दिन भर उनके बच्चे और गृहणी घर में रहते ....और कभी जब काम वाली  जल्दी आती मैं नींद में खोया होता , तब वह  बिना आवाज़  किये चुपचाप अपना काम करके चली जाती ...ऐसे में उसका दीदार मैंने  कभी किया ही नहीं था ....


छुट्टी का दिन था और काम वाली बाई जिसका नाम लता था आज देर से आई थी , तब तक  मैं उठ चूका था , पर अलसाया सा नींद में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ था , उसने मुझे यूँ पड़े देखा तो बोली , मैं झाड़ू बाद में लगा दूंगी तब तक मैं कपडे धो लेती हूँ ...मैंने  कोई जवाब न दिया और आँखे बंद कर ऊँघने लगा ...कपड़ो पर  जब थपकी की फटकार लगी तो मेरी आँखे खुली ।  मेने देखा ,वह  घर के पोर्च में, कपडे धोने के लिए उन्हें थपकी से कूट रही थी ....


मैं भी कमरे से बहार निकल आया और पोर्च पर  पड़ी चारपाई पर बैठ बाहर  का नज़ारा  देखने लगा ।  लता अपने कपड़ों  में लगी हुई थी ...की अचानक मेरी नज़र उसपर  पड़ी ...इस वक़्त उसने अपनी साड़ी घुटनों तक चढ़ा रखी थी जिससे उसकी गोरी गोरी पिंडली बाहर  झांक रही थी , फिर जैसे ही उसने कपड़ों  को निचोड़ने के लिए उन्हें मरोड़ा , तो उसका आँचल नीचे गिर गया , उसने आधे गले  का कट ब्लाउज पहन रखा था , जिसमे से उसके उरोज उछल कूद कर निकलने को बेताब हो रहे थे ....


जब जब वह  कपड़ो पर थपकी की फटकार लगाती , तब तब उरोज, थपकी की ताल से ताल मिलते हुए अपनी अपनी जगह उछलते ....


देखने में यह एक  आम सा दृश्य था , जो आज से पहले ,ना जाने कितनी बार, मैंने  घर में कामवाली बाई को ऐसा करते  देखा था ।  पर उस वक़्त मुझे इनमें  कोई रोचकता न लगी थी , आज शायद मेरी उत्सुकता थी या मेरी मर्दानगी की जरुरत , वही सीन देखने से एक  अलग ही आनन्द का अनुभव हो रहा था ....


लता ने मुझे यूँ बैठे देखा तो मुस्कुरा कर बोली , क्यों भैया ! आज जल्दी उठ गए और हँसते हुए अपने काम  में लग गई ?...मैं भी ,कभी उसे, तो कभी बाहर  के नज़ारे को देख अपना टाइम काट रहा था ..करने को कुछ था नहीं , इसलिए उसका नज़ारा ही समय काटने का  एक  मात्र विकल्प था ....


अब मर्द अपने को कितना भी स्मार्ट दिखाए , पर वह  नारी की चील जैसी आँखों से बच नहीं सकता ...लता  ने ना जाने कब और कितनी बार मुझे कनखियों से अपनी और ताड़ते हुए देखा.. यह मुझे उस दिन नहीं... बाद में पता चला ...


लता ने मुझे देखा और मुस्कराने  लगी ।मैने  भी झेप मिटाने के लिए उसकी  तरफ देखा और  हंस दिया ।  कपडे धोते धोते , उसने अचानक ही मुझसे पुछा की मैं यहां क्यों रहता हूँ ? यह कमरा कोई बहुत अच्छा तो नहीं ?असल में वह  कमरे का सेट  बहुत ज्यादा अच्छा ना था ।  होने को साथ में किचन था , पर बाथरूम ना था , सिर्फ इक टॉयलेट वह  भी दुसरे किरायेदार के साथ सांझे में था , ऐसे में मुझे किचन में नहाना पड़ता था ....मैं बोला , असल में मुझे जल्दीबाजी में बस यही सेट किराये पर मिला , फिर मुझे लगा बाद में बदल लूँगा , पर मौका ही नहीं मिला । वह  बोली आप चिंता ना करो , मेरी नजर में एक  कमरा है वह जल्दी खाली  हो जायेगा , तब मैं आपको बता दूंगी और आप उसे देख लेना , उसमे किचन तो नहीं है , पर बाथरूम पूरा है और ऐसा कह वह  खिलखिला कर हंस दी ...


अब जब भी वह  सुबह  काम पर आती , मेरी नींद अचानक खुल जाती , वह  झाड़ू पोछा कर रही होती और मैं एक  आँख बंद किये उसे निहार रहा होता  , पता नहीं उसे यह सब पता होता भी नहीं या उस पर  अपने काम का दबाब होता , जिसके चलते वह  किसी और चीज पर  ध्यान ना देती ...


अब जब भी वह  सफाई करती , मैं उसकी उठी हुई साड़ी से झांकती पिंडलियों या गिरे हुए पल्लू से मचलते उभारो को निहारने का मौका ना छोड़ता यूँही ताका झांकी करते करते 2 /3  महीने बीत गए ।  इस दौरान मेरे मकान मालिक ने , इशारों ही इशारों में अपनी लड़की से मेरी मुलाकात भी करवा दी , वह 19 /20  साल की मासूम सी लड़की थी , जिसपर  अपनी नज़रें  इनायत करने की गुस्ताखी मैंने  नहीं की , मुझे देखने में वह  भली लगी , इसलिए उसके घर वालो की छुट के बावजूद मैंने  उसपर हाथ नहीं रखा ...


शायद शेर को इस उम्र में भी ,किसी का यूँ फैंका हुआ टुकड़ा रास नहीं आया या फिर चरित्र भी कोई चीज है ...


एक  दिन लता ने बताया की वह  कमरा खाली है , शाम को वह  मुझे वह  मकान दिखा देगी ।  पर मुझसे शाम तक रुकने का सब्र ना हुआ और में अकेला ही मकान देखने चला गया । वह  मकान एक  तीन मंजिला मकान था , जिसके सबसे ऊपर के माले पर सिर्फ एक कमरा और उसके साथ अटैच्ड बाथरूम बना था .. गर्मियों के दिन थे , मुझे कमरा हवादार लगा और साथ में पूरी खुली हुई छत थी ...तो मैंने  उस कमरे को किराये पर ले लिया ...

जिन्दगी फिर से अपने ढर्रे पर चलने लगी , यहां  पर न कोई बोलने वाला था ना कोई टोकने वाला , बस महीने के एक  दिन मकान मालिक को किराया दे देता ।  यूँ तो उस मकान में कई और किरायेदार थे , पर मैंने  कभी किसी से कोई बातचीत नहीं की ....क्योकि सबका एक  ही सवाल होता ,की मैंने  अब तक शादी क्यों नहीं की ? अगर की है तो यूँ अकेला छड़ो की तरह क्यों रहता हूँ?


गर्मियों में तो उस मकान में मुझे कोई खामी नजर नहीं आई , पर जब सर्दिया आई और सर्दी की तेज तेज हवा चलती , तब कमरा बहुत ठंडा हो जाता ...लता , पहले की तरह ही मेरे कमरे में आती और अपना काम करके चुपचाप चली जाती ....अब मैं भी उसे ताक ताक के थक चूका था ....दूसरे वह अब कपडे बाथरूम में धोती ...


एक  दिन वह  काम करने थोड़ी देर से आई ।  तब तक मैं उठ कर अपनी दिनचर्या से निबट चूका था ... उस वक़्त वह  कुछ रूवांसी सी लग रही थी ।मैने पूछा क्या बात है ? उसने बताया की, उसका पति कुछ महीने पहले उसे छोड़ कर गल्फ में नौकरी करने चला गया है ... इतने महीने बीतने के बाद  उसकी  खोज खबर  तो  मिली ...पर उसने एक धेला भी नहीं भेजा है .... उसकी वजह से उसके ऊपर कर्ज चढ़ा हुआ है ...वरना वह  यह काम कभी नहीं करती ....


इतने दिनों में , आज मैंने  उससे पहली बार  बात की थी ..उसने अपने आसूं पोछे  और काम में लग गई । मैंने  भी ज्यादा कुरेदना ठीक ना समझा ।  कमरे में झाड़ू मारते हुए , उसने कहा , आज मैं एक  नए घर में काम करने गई तो ,वहां  दो मुस्टंडे रहते थे ,मैंने  तो उन्हें देख कर ही मना कर दिया ....की मैं छड़ों के यहां काम नहीं करती , सिर्फ बीवी बच्चे वालो के यहां काम करती हूँ ...


उसकी इस बात पर  मुझे बहुत जोर की हंसी आई , वह  बोली , इसमें हँसने  की क्या बात है ?

मैं बोला... मैं भी तो छड़ा  हूँ ! मुझसे डर नहीं लगता ...इस पर उसने एक  गहरी नज़र  डाली और बोली , तुमसे कैसा डरना ?

और ऐसा कह उसने पास पड़ी सब्जी काटने की छुरी उठा ली .और मेरी तरफ नचा कर बोली , तुमने कभी कोई गलत हरकत की तो , इससे तुम्हारा काट दूंगी ...अब तक तो मैंने  उसमे कोई दिलचस्पी ना दिखाई थी , पर उसके यह कहने से मुझे उसका इशारा समझ आ गया ...

मैं उसके करीब गया और झाड़ू लेकर एक  तरफ रख दी ... उसने मुझे देखा और छुरी को नाचते हुए बोली , मुझे छूना मत ....मैं उसके और करीब गया और उसके गाल पर हाथ रख दिया और बोला , इतना गुस्सा अच्छा नहीं ......

ऐसा कह मैं कमरे से बहार आकर छत पर टहलने लगा । मैंने ऐसा कर तो दिया था , पर मेरा दिल डर के मारे जोर जोर से धडक रहा था , कहीं  इसने हल्ला मचा दिया , या लोगो को यह बोल दिया की मैं इसे अकेली देख छेड़ रहा था , तब मेरा क्या होगा ...झाड़ू लगाने के बाद , लता बाहर  आई और बोली अन्दर आ जाओ बाहर  ठण्ड है ...मैंने  झाड़ू लगा दी है ...मैं अन्दर आया और चुपचाप फोल्डिंग पलंग पर लेट गया , मेरा दिल डर के मारे अभी भी धक् धक् कर रहा था ...

लता ने कपडे धोकर बाहर  सूखने डाल दिए और कमरे में मेरे बिस्तर के पास आकर खड़ी हो गई और बोली ..अब बोलो तब क्या कह रहे थे ...मैंने  उसे टुकुर टुकुर देखा और उसका हाथ पकड कर बोला , तो अब क्या करोगी , मुझसे डरोगी नहीं ...वह  जैसे इसी का इंतजार कर रही थी , वह  मेरे करीब आई और उसने अपनी बांहे मेरे गले में डाल दी ..मैंने  भी उसे अपने ऊपर बिस्तर पर खींच  लिया ...अभी वह  मेरे साथ बिस्तर पर आई ही थी की , एक  झटके में उठी और बोली , अरे दरवाजा तो बंद कर लो और ऐसा कह उसने खुद दरवाजे का कुंडा लगा दिया और आकर मेरी बाहों में खो गई ....

जब वह  बांहों में आ गई तो मुझे लगा अब सब काम आसन है , मैंने  उसे चूमने के लिए जैसे उसके होठों  को चूमा , तो लगा जैसे किसी ऐश ट्रे में मुँह  लगा दिया , वह  शायद बीड़ी  पीती होगी ... फिर उसके ब्लाउज को हटाया तो , उन्हें देख दिल निराशा में डूब गया , जो बाहर से देखने में किसी गेंद जैसे लगते थे , अन्दर से किसी निचुड़े हुए संतरे जैसे थे , जिनमे ना कोई कठोरता थी ना ही कोई ठहराव  ...लागता था उसके बच्चो ने जैसे अपनी माँ के अन्दर की औरत को पूरी तरह से निचोड़ डाला था ...


फिर भी किसी तरह उससे चिपके चिपके मैंने  उसके गालों,  उरोजो और नाभि को काफी देर तक चूमा ...वह  आँखे बंद किये जैसे सपने में खो गई .. काफी देर चूमा चाटी के बाद ... मेने सोचा  चलो अपनी मंजिल की तरफ बढ़ा जाए ...अभी मैंने  उसकी साड़ी को घुटने से ऊपर उठाया ही था की उसने एक  झटके में मेरा हाथ झटक दिया और बोली अरे क्या करते हो , बच्चा हो गया तो ? और ऐसा कह वह  हंसती हुई बिस्तर से बिजली की तरह उठी और कमरे से बाहर  चली गई ...मैं अपना मन मसोस कर उसे यूँ जाते देखता रहा ....


क्रमश : ..............

By
Kapil Kumar 


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